क्या हो रहा है?
लेबनानी स्वास्थ्यकर्मियों और अधिकारियों का कहना है कि दक्षिण लेबान के मेडिकल स्टाफ और सुविधाओं पर इज़राइली हवाई हमले जानबूझकर किए जा रहे हैं। वे इसे एक व्यवस्थित कोशिश मानते हैं जिससे इलाके को रहने योग्य न बनाया जा सके।
मुख्य आँकड़े
- 2 मार्च से संघर्ष तेज हुआ।
- कम से कम 128 मेडिकल सुविधाएँ और एम्बुलेंस पर हमला हुआ।
- 40 स्वास्थ्यकर्मी मारे गए और 107 घायल हुए, यह आँकड़े लेबनानी स्वास्थ्य मंत्रालय के हैं।
- कम से कम पाँच बार ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट मिली जिनमें डबल-टैप स्ट्राइक का इस्तेमाल हुआ, यानी पहली चोट के बाद थोड़ी देर रुका जाता है ताकि बचावकर्मी मौके पर आएं और फिर दूसरा हमला किया जाए।
डॉक्टरों और पैरामेडिक्स की बात
पत्रकारों ने नाबातीह और टायर के कुछ नष्ट हुए मेडिकल सेंटर्स का दौरा किया और कई स्वास्थ्यकर्मियों से बात की। निरीक्षण में उन साइट्स पर कोई सबूत नहीं मिला कि उनका सैन्य इस्तेमाल किया गया था। स्थानीय कर्मियों का कहना है कि हमलों का पैटर्न अस्पतालों, क्लीनिक्स और एम्बुलेंस पर केंद्रित रहा है, खासकर जब बचावकर्मी शाम के समय रोज़ा खोलने के लिए इकट्ठा होते थे।
डबल-टैप और अंतरराष्ट्रीय कानून
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मेडिकल स्टाफ और अस्पताल नागरिक माने जाते हैं और उनकी जानबूझकर निशानाबंदी युद्ध अपराध मानी जा सकती है। अमनेस्टी इंटरनेशनल ने स्पष्ट किया है कि राजनीतिक पृष्ठभूमि के बावजूद स्वास्थ्यकर्मी नागरिक ही होते हैं और उन पर हमला गैरकानूनी है।
इज़राइल का बयान और उसकी कमी
इज़राइली सेना ने आरोप लगाया कि हिज़बुल्लाह कभी-कभी एम्बुलेंस या मेडिकल सुविधाओं का सैन्य उपयोग कर रहा है और यदि ऐसा चलता रहा तो वे अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप कार्रवाई करेंगे। यह आरोप 2024 में भी लगाया गया था, पर अब तक कोई ठोस प्रमाण पेश नहीं किया गया। लेबनानी स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस आरोप की निंदा करते हुए कहा कि इससे उन हमलों को जायज़ दिखाने की कोशिश की जा रही है।
किसे निशाना बनाया जा रहा है?
हमलों का सबसे बड़ा हिस्सा इस्लामिक हेल्थ एसोसिएशन (IHA) पर गया है, जो हिज़बुल्लाह से जुड़ी एक स्वास्थ्य सेवा है और लेबनानी स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ काम करती है। इसके अलावा राज्य सिविल डिफेंस, आमल मूवमेंट की स्वास्थ्य सेवा, एक स्थानीय चैरिटी और लेबनान रेड क्रॉस भी हमलों की जद में रहे हैं।
स्थानीय कर्मियों के अनुभव
IHA के आपातकालीन प्रमुख अब्दुल्ला नूर अल-दीन ने कहा कि उद्देश्य क्षेत्र को "रहने योग्य नहीं बनाना" जैसा दिखता है। कई विस्थापित लोग शहरों में जगह न मिलने पर वापस लौटे और तुरंत बाद उनके घरों पर बम गिरे। जब बचावकर्मी मदद के लिए पहुंचे तो उन्हें भी निशाना बनाया गया।
एक उदाहरण: 8 मार्च को ज़िफ्ता में IHA का एक आपात सेंट्रल पूरा नष्ट हो गया। वहां काम करने वाले दो कर्मचारी मारे गए और एक पक्षाघातित हो गया। एक नया प्रमुख याद करते हैं कि उन्होंने इफ्तार पर वीडियो कॉल की थी और अगले पल वही लोग मलबे के नीचे मिले।
बचावकर्मियों की सुरक्षा के लिए बदलती आदतें
पहले तीन सदस्यों वाली टीमों को अब दो लोगों तक घटा दिया गया है। काम के दौरान परिवार और दोस्तों से मिलने पर रोक है। वे एक-दूसरे से दूरी रखते हैं और एम्बुलेंस अलग-अलग जगह खड़ी करते हैं ताकि एक सिंगल स्ट्राइक में पूरा दल न मरे।
एक पैरामेडिक ने बताया कि वे कोशिश करते हैं कि ऊपर बैठे ड्रोन के लिए स्पष्ट दिखे कि वे मेडिकल कर्मी हैं, ताकि हमला न किया जाए, पर यदि सामने वाली पार्टी नैतिकता पर ध्यान ही नहीं दे तो सारी सावधानियाँ बेअसर हो जाती हैं।
अस्पतालों पर दबाव और मानवीय हालात
सिर्फ मेडिकल सेंटर्स को नहीं, पूरे इलाके की नागरिक बुनियादी सुविधाओं पर हमले हो रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि 17 दिनों की लड़ाई में 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए और 2,584 घायल हुए। नाबातीह के सरकारी अस्पताल में घायलों का आना लगातार बना हुआ है, लेकिन सख्ती और भय बढ़ गया है।
एक मरीज पेट्रोल पम्प के पास था जब वह हमला हुआ; उसके शरीर के कई हिस्से जल गए और ऑपरेटिंग रूम तक पहुंचते समय कमरे में जलते हुए मांस की गंध थी। अस्पताल प्रमुख ने कहा कि इस बार हमले और भी अधिक हिंसक लगते हैं और घायलों की बजाय मृतक संख्या बढ़ रही है।
ज़िम्मेदारी और हौसला
पहले पैरामेडिक कह रहे थे कि युद्ध से पहले वे काम पर लौटना पसंद नहीं करेंगे, फिर भी जैसे ही संघर्ष शुरू हुआ सब वापस सेवा में आ गए। उनका कहना है कि क्या वे और क्या छोड़ देंगे? यह उनका घर है और इसलिए मदद कर रहे हैं।
निष्कर्ष: स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों की रिपोर्ट और जांच यह बताती है कि मेडिकल सुविधाओं और एम्बुलेंस पर लगातार हमले हो रहे हैं, जिनके पीछे इलाके को खाली कराना या अस्थिर बनाना उद्देश्य प्रतीत होता है। अंतरराष्ट्रीय कानून मेडिकल स्टाफ की रक्षा करता है, लेकिन मैदान पर हालात बदल रहे हैं और बचावकर्मियों को अपनी जान बचाने के लिए नई आदतें अपनानी पड़ रही हैं।