पेरिस, फ्रांस — 2 मार्च को इमैनुएल मैक्रों ने घोषणा की कि फ्रांस अपनी परमाणु क्षमता मजबूत करेगा और यूरोपीय साथियों के साथ रक्षा-समन्वय बढ़ाएगा। यह घोषणा ऐसे समय में आई जब मध्यपूर्व में संघर्ष तेज था और अमेरिका तथा इज़राइल की कार्रवाइयों ने वैश्विक सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए थे। मैक्रों ने अपनी नीति के लिए शब्द इस्तेमाल किया: forward deterrence.

क्या बदला और क्यों यह महत्त्वपूर्ण है

इस भाषण से मैक्रों ने एक स्पष्ट संदेश दिया: यूरोपीय देश अब अकेले अमेरिका पर परमाणु संरक्षण के भरोसे नहीं रहना चाहेंगे। फ्रांस दुनिया में चौथी सबसे बड़ी परमाणु शक्ति रखता है और उसके पास लगभग 290 वारहेड हैं। साथ ही फ्रांस अब वारहेड की संख्या सार्वजनिक नहीं करेगा।

फ्रांस की सामरिक सोच और इतिहास

फ्रांसीसी परमाणु नीति की जड़ें जनरल चार्ल्स डी गॉल के वक्त से हैं। उस नीति का मकसद देश की क्षेत्रीय रक्षा और राजनीतिक स्वतन्त्रता सुनिश्चित करना रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि फ्रांस की परिभाषा "महत्त्वपूर्ण हित" राष्ट्रीय सीमाओं से आगे निकलती है और इसमें यूरोपीय आयाम हमेशा शामिल रहा है।

अनिश्चितता पर संरक्षित लाभ

विश्लेषक ग्रेगॉयर रूज़ का कहना है कि फ्रांस जानबूझकर जियोग्राफिक सीमा अस्पष्ट रखता है ताकि उसका परमाणु विकल्प बहुमुखी और प्रभावी बना रहे। मैक्रों ने इस अस्पष्टता को दोहराया और कहा कि संकेत स्पष्ट होने चाहिए, पर निर्णय और नियंत्रण राष्ट्रीय ही रहेंगे।

यूरोप के साथ अधिक समन्वय

फ्रांस अब कुछ यूरोपीय राष्ट्रों के साथ परमाणु क्षमता के आस-पास और अधिक नज़दीकी काम करना चाहता है। जिन देशों का नाम चर्चा में आया है उनमें शामिल हैं:

  • यूनाइटेड किंगडम
  • जर्मनी
  • पोलैंड
  • नीदरलैंड
  • बेल्जियम
  • ग्रीस
  • स्वीडन
  • डेनमार्क

रूज़ बताते हैं कि इसका मतलब कभी-कभार फ्रांसीसी बमवाहक या लड़ाकू विमानों को अन्य यूरोपीय राज्यों के क्षेत्र में स्थित करना भी हो सकता है।

ईरान का मुद्दा और फ्रांस की प्रतिक्रिया

मध्यपूर्व में बढ़ती हिंसा के बीच ईरान का नाभिकीय कार्यक्रम फिर चर्चा में है। फ्रांस स्पष्ट रूप से चाहता है कि ईरान के पास परमाणु हथियार न हों, पर साथ ही सैन्य कार्रवाई को समस्या का समाधान नहीं मानता। मैक्रों ने अमेरिका और इज़राइल की हालिया कारवाईयों की निंदा करते हुए कहा कि वे अंतरराष्ट्रीय कानून के बाहर थीं।

फ्रांसीसी शोधकर्ता लौरे फूशर कहती हैं कि फ्रांस हमेशा कूटनीतिक रास्ते को प्राथमिकता देता रहा है और सैन्य विकल्प से जटिल समस्याएँ सुलझती नहीं।

ईरान और फ्रांस का उलझा हुआ अतीत

फ्रांस और ईरान के बीच रिश्ते लंबे अरसे से पेचीदे रहे हैं। 1974 में ईरान ने फ्रांस की एक यूरेनियम कंपनी में हिस्सा लिया था ताकि नागरिक न्यूक्लियर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए ईंधन मिल सके। 1979 की क्रांति के बाद तनाव बढ़े और दोनों पक्षों के बीच कई विवाद हुए।

1980 के दशक में लेबनान में हुए कुछ घटनाक्रमों ने दोनों देशों के बीच रिश्तों को और बिगाड़ दिया। अंततः 1988 में कुछ बंधकों की रिहाई के बदले यूरेनियम प्रकरण से जुड़ा अधिकांश ऋण वापस किया गया और कुछ वर्षों बाद शेष राशि का निपटारा हुआ।

जियोपॉलिटिकल परिवेश और चुनौतियाँ

2015 का संयुक्त व्यापक कार्य योजना समझौता ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध लेकर आया था। पर 2018 में अमेरिका की वापसी के बाद स्थितियाँ बदल गईं और ईरान ने कई प्रतिबंधों के अनुपालन में ढील दी।

रूज़ कहते हैं कि आज हम एक ऐसे युग में हैं जहाँ पारंपरिक खतरे और युद्ध फिर से तेज़ी से लौट रहे हैं। इसीलिए परमाणु विकल्प को मीज़ पर दिखाना जरूरी समझा जा रहा है। मैक्रों ने साफ कहा: "हम एक अलग सामरिक ब्रह्माण्ड में हैं" और उनका अनुमान है कि अगले पचास वर्ष 'परमाणु हथियारों का युग' होगा।

वित्तीय और राजनीतिक असाइनमेंट

शक्ति बढ़ाने का मतलब भारी धनराशि चाहिए। रूज़ के मुताबिक़ फ्रांस को स्थायी रूप से अपनी रक्षा क्षमता बढ़ाने के लिए सालाना कम से कम अतिरिक्त लगभग 100 अरब यूरो की आवश्यकता होगी। यह पैसा नया कर्ज लेकर नहीं आएगा, बल्कि अन्य खर्चों में कटौती करके और कुल रक्षा बजट बढ़ाकर जुटाना होगा।

मैक्रों का कार्यकाल लगभग एक साल में समाप्त होने वाला है और 2027 के अप्रैल में चुनाव होने हैं। घरेलू तौर पर उनकी स्वीकार्यता कमज़ोर बताई जाती है और विश्लेषकों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर कार्रवाई करके वे यूरोप में अपनी विरासत कायम करना चाह रहे हैं।

निष्कर्ष

मैक्रों की घोषणा न सिर्फ़ फ्रांस की रक्षा नीति का पुनरुत्थान दिखाती है बल्कि यूरोप को सुरक्षा मामलों में अधिक आत्मनिर्भर बनाने की आकांक्षा भी दर्शाती है। सामने की चुनौतियाँ बड़ी हैं। वित्तीय बोझ, राजनीतिक समर्थन और यूरोपीय समन्वय की जटिलता ऐसे मुद्दे हैं जिनका हल मिलकर करना होगा।