वॉशिंगटन के साथ सौदे की भाषा

फिनलैंड के राष्ट्रपति एलेक्ज़ेंडर स्टब्ब, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के गोल्फ साथी भी हैं, का कहना है कि ट्रंप के साथ काम करने का तरीका शायद वही पुराना, सीधा और थोड़ा असुविधाजनक तरीका है: पहले उनकी चाहत समझिए, फिर अपनी शर्त रख दीजिए। स्टब्ब के मुताबिक यूरोप ईरान के मुद्दे पर ट्रंप की मदद कर सकता है, लेकिन बदले में अमेरिका को यूक्रेन के समर्थन में ठोस कदम दिखाने होंगे।

स्टब्ब ने इसे "वाकई अच्छा विचार" बताया कि ट्रंप के साथ इस तरह की लेन-देन वाली बातचीत की जाए। उनका कहना है कि राष्ट्रपति चाहते हैं कि यूरोप हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने में उनकी मदद करे। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, जैसा कि हमेशा होता है, आधे सहयोग और आधी सौदेबाज़ी का नाम है।

यूक्रेन के बदले ईरान

स्टब्ब की सोच बहुत सरल है। अगर वॉशिंगटन यूरोप से किसी संवेदनशील क्षेत्रीय मसले पर सहयोग चाहता है, तो यूरोप भी यूक्रेन के सवाल पर अमेरिका से साफ़ जवाब मांग सकता है। इस तर्क में नाटकीयता कम है और व्यावहारिकता ज़्यादा। ट्रंप जिस तरह मौजूदा विश्व व्यवस्था को झकझोर रहे हैं, उसके बीच सहयोगी अब यह मानने लगे हैं कि समर्थन खुद-ब-खुद नहीं मिलेगा। उसे सामने रखकर माँगना पड़ेगा।

ब्रेक्ज़िट पर भी साफ़ राय

इसी दिन स्टब्ब ने ब्रिटेन के भविष्य को लेकर भी अपनी राय रखी। उनका मानना है कि यूनाइटेड किंगडम आखिरकार एक दिन फिर से यूरोपीय संघ में लौटेगा। और अगर यह उम्मीद थोड़ी तेज़ लगती है, तो उनके ब्रेक्ज़िट वाले बयान पर ध्यान दीजिए। स्टब्ब के शब्दों में, ब्रेक्ज़िट ऐसा था जैसे बिना किसी वजह के अपनी ही टांग काट लेना।

रक्षा और व्यापार में और निकटता

फिनलैंड के राष्ट्रपति का कहना है कि जब ट्रंप दुनिया की पुरानी व्यवस्था को तोड़ रहे हैं, तब यूरोप को रक्षा और व्यापार के मोर्चे पर ज्यादा एकजुट होना चाहिए। उनके अनुसार, मौजूदा हालात में यूरोप के लिए बेहतर रास्ता आपसी सहयोग बढ़ाना है, न कि हर देश का अलग-अलग दिशा में भागना।

यह कोई बहुत चौंकाने वाला निष्कर्ष नहीं है, लेकिन समय ने इसे फिर से प्रासंगिक बना दिया है। जब वैश्विक राजनीति बार-बार नई अनिश्चितता पैदा कर रही हो, तो यूरोप को कम से कम अपने भीतर थोड़ी स्थिरता तो दिखानी ही होगी।