छोटी चीज़ें, बड़ी जिन्दगियाँ
गैज यानी टूटी-फीली पट्टियाँ आवाज़ में मामूली दिखती हैं, पर ये जीवन बचाती हैं। अल-शिफा अस्पताल में गैज की कटौती मतलब घाव खुले रह जाते हैं, बैक्टीरिया वहाँ बैठ जाते हैं, और छोटी सी समस्या बड़ी बीमारी बनकर हड्डी तक फैल सकती है।
एक आंशिक सीज़फ़ायर, पर हालत वही पुरानी
अक्टूबर 2023 के बाद जो हिंसा शुरू हुई, उसकी लहरें गाजा के स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर को बहुत कमजोर कर चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय संगठन कहते हैं कि पूरे पट्टी के 36 अस्पतालों में से सिर्फ करीब 14 ही काम कर रहे हैं। कई स्वास्थ्यकर्मी मारे जा चुके हैं और कुछ को हिरासत में लिया गया है।
क्यों गैज की कमी खतरनाक है
- घाव बिना पट्टी के रुकते नहीं: संक्रमित घावों से बचाव के लिए साफ गैज चाहिए।
- मकानों की हालत: ज्यादातर लोग तंबू में रहते हैं; सर्दियों में पानी भर गया और वहां सफाई का कोई भरोसा नहीं।
- एंटीबायोटिक की कमी: सही समय पर दवा न मिलने पर छोटी-छोटी सूजन भी अम्प्यूटेशन तक पहुंच सकती है।
विदेशी डॉक्टर्स की दिक्कतें और 'छिपा कर लाने' की कहानियाँ
सीज़फ़ायर के बाद कुछ विदेशी डॉक्टर और राहतकर्मी गाज़ा आने लगे। पर सीमा पार करने की शर्तों ने मेडिकल सामान लाना मुश्किल कर दिया। कई ने बताया कि इजरायली और अन्य चेकपॉइंट पर उपकरण और दवाइयाँ रोक दी जाती थीं। इसलिए कुछ डॉक्टरों ने जरूरी सामान अपने लगेज में छुपा कर लाया—गैज, बैटरियाँ, कान के इम्प्लांट, पीरियडिक दर्द निवारक और एंटीबायोटिक्स तक।
कुछ डॉक्टरों की आवाज़ें साफ थीं: वे कहते हैं कि अनुमति है पर सामान नहीं आता, और यह पैटर्न हेल्थकेयर में व्यवधान पैदा करता है। एक डॉक्टर ने कहा कि कभी-कभी सामान जब्त कर दिया जाता है, और कभी अनपेक्षित चीजें अंदर चली जाती हैं।
सीज़फ़ायर का मतलब यह नहीं कि युद्ध खत्म
अंतरराष्ट्रीय डॉक्टरों का कहना है कि गोलीबारी की दर घट गई हो पर बन्दूकें और गोलीबारी अभी भी होती हैं। सीज़फ़ायर के बीच कुछ ही महीनों में कुछ सौ लोगों की जानें चली गईं, और गिनती 72,000 के ऊपर पहुंच चुकी है, जिसे कई बार कम आँकना भी बताया गया है।
राफाह पार करने की प्रक्रिया ढीली-झीली हुई तो भी बड़ी संख्या में चिकित्सा ज़रूरतमंद लोगों को बाहर भेजा नहीं गया। कुछ ही लोगों को निकाला गया, जबकि हजारों का इंतज़ार था।
अल-शिफा: अच्छी तरह क्षतिग्रस्त, पर फिर भी काम कर रहा
अल-शिफा अस्पताल मशीनरी और भवनों के नुकसान के बाद भी कुछ सेवाएँ दे रहा है। पेडियाट्रिक आईसीयू जैसे कुछ हिस्से खुले हैं, पर कुल मिलाकर यह पहले जैसा नहीं है। कई सीनियर डॉक्टर या तो मारे गए, हिरासत में हैं या चले गए हैं। युवा रेजिडेंट्स को कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं कि किसको प्राथमिकता देनी है।
घावों के लिए गैज के छोटे-छोटे पैकेटों की खोज यहां निर्णायक हो जाती है। डॉक्टर बताते हैं कि अगर कहीं एक बॉक्स गैज मिल जाए और वो इस्तेमाल योग्य हो, तब उसे जीत के रूप में लिया जाता है।
भावनात्मक और शारीरिक असर
जहाँ हिंसा धीमी हुई, वहाँ जो खाली समय आया वह भावनात्मक संकट लेकर आया। स्टाफ को डर और दुःख की कहानियाँ याद आती हैं। कई लोग इस अनुभव को शब्दों में बताना शुरू कर देते हैं।
कंक्रीट की धूल इतनी है कि फेफड़ों पर दीर्घकालिक असर की आशंका जताई जा रही है। एक फेफड़ों के विशेषज्ञ ने कहा कि यह असर दशकों तक रह सकता है।
अच्छा तो क्या उपाय है?
- न्यूनतम आवश्यक सामग्री की सुचारु आपूर्ति जरूरी है: गैज, बाँध, एंटीबायोटिक और बेसिक उपकरण।
- सीमा प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और पूर्व-समन्वय से रोकथाम घट सकती है।
- स्थानीय चिकित्सा स्टाफ का समर्थन और सुरक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए।
अंत में: गाज़ा केवल समस्याओं का बिंदु नहीं
गलतफहमी यह है कि गाज़ा सिर्फ एक युद्ध का नतीजा है। वहाँ की जो आबादी बची है, वे खूबसूरत और मेहनती हैं। अस्पतालों में काम करने वाली युवा नर्सें और तकनीशियन जीवन की सामान्य-सी चीजों के लिए जूझते हुए भी उम्मीद दिखाती हैं।
पर असल सवाल यही है: क्या दुनिया इतना कर्तव्यबोध दिखा पाएगी कि बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएँ और सुरक्षा बहाल हों? अल-शिफा की कहानियाँ बताती हैं कि लड़ाई का असर सिर्फ बमों से नहीं, रोजमर्रा की चीजों के अभाव से भी होता है।