संक्षेप में: अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) कहती है कि हाल का युद्ध और उससे उपजा तेल आवक का व्यवधान इतिहास में सबसे बड़ा हो सकता है। एजेंसी 1974 में 1973 के तेल प्रतिबंध के जवाब में बनी थी, और आज की स्थिति में उसी पुराने दर्द के कुछ नए पहलू दिखते हैं।

1973 में क्या हुआ था?

6 अक्टूबर 1973 को मिस्र और सीरिया ने इजराइल पर अचानक हमला किया ताकि 1967 में खोई हुई जमीन वापस ली जा सके। उस समय हिंसा यरूशलम और अन्य क्षेत्रों में पुराने तनावों से जुड़ी थी।

सऊदी अरब के राजा फैसल ने अमेरिका को चेतावनी दी कि अगर वह इजराइल का समर्थन करता है तो तेल आपूर्ति जोखिम में पड़ेगी। बावजूद इसके, अमेरिकी नेतृत्व ने इजराइल का सैन्य समर्थन किया।

इसके जवाब में अरबी तेल निर्यातक देशों ने अपना कदम उठाया: कीमतें लगभग 70 प्रतिशत बढ़ीं, उत्पादन में कटौती हुई और अमेरिका समेत कुछ देशों को तेल सप्लाई पर रोक लगाई गई। उस समय मध्यपूर्व वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग 36 प्रतिशत दे रहा था और दुनिया 4.5 मिलियन बैरल प्रति दिन की कमी से जूझ गई थी।

1973 के तेल प्रतिबंध का दाम क्या उठा?

कच्चे तेल की कीमत महीनों में कम से कम $3 से ऊपर जाकर $12 से भी ज्यादा हो गई। अमेरिकी पेट्रोल-कीमतें भी तेज़ी से बढ़ीं। 1973 की शुरुआत में जहां पेट्रोल प्रति गैलन करीब $0.38 था, 1974 में वह $0.55 तक पहुंच गया। पंपों पर भी ईंधन की कमी आम बात हो गई।

संरक्षण के उपायों के तहत गति सीमा घटाई गई, ईंधन राशनिंग लागू हुई और आपातकालीन उपायों के रूप में साल भर का डेलाइट सेविंग समय अपनाया गया। कई देशों ने कामकाजी दिन घटाए या ड्राइविंग पर पाबंदियां लगाईं।

अब क्या फर्क है, आज पेट्रोल की कीमतें कैसी हैं?

इस साल युद्ध शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड करीब $66 प्रति बैरल था। युद्ध के पहले हफ्ते में यह $100 से ऊपर चला गया, लगभग 60 प्रतिशत वृद्धि। अमेरिका में कुछ राज्यों में पेट्रोल की कीमतें $5 से ऊपर पहुंचीं और कुछ जगहों पर $8 तक रिपोर्ट हुई।

अन्य देशों में भी तेज़ बढ़त दिखी: कंबोडिया में लगभग 68 प्रतिशत, वियतनाम में लगभग 50 प्रतिशत, नाइजीरिया 35 प्रतिशत, लाओस 33 प्रतिशत और कनाडा 28 प्रतिशत तक इंधन की कीमतें बढ़ीं।

हॉरमुज़ की भूमिका और सप्लाई शॉर्टफॉल

आज समस्या का बड़ा कारण स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ में पारगमन का रुकना है। इस चौराहे से करीब 20 मिलियन बैरल प्रति दिन से अधिक तेल की ढुलाई सामान्यत: होती है, जो वैश्विक खपत का लगभग एक-पाँचवां भाग है।

कुछ पाइपलाइनों के जरिये गैवलकाल जैसी एजेंसियों ने अनुमान लगाया है कि अधिकतम 3.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन को दूसरी दिशा से भेजा जा सकता है, पर यदि जलमार्ग का अधिकतर ट्रैफ़िक रुका रहा तो सप्लाई की कमी लगभग 15 मिलियन बैरल प्रतिदिन तक रह सकती है।

1973 के बाद क्या हुआ?

प्रतिबंध मार्च 1974 में हट गया, पर आर्थिक असर दशक भर बना रहा। अमेरिका में महंगाई 1974 में 12.3 प्रतिशत तक गई, बेरोजगारी बढ़ी और आर्थिक वृद्धि सिकुड़ी। दुनिया भर में उर्वरक और खाद्य कीमतों पर प्रभाव पड़ा क्योंकि तेल और गैस कई उद्योगों के लिए जरूरी थे।

केंद्रीय बैंकों ने ब्याज़ दरें बढ़ाईं। अमेरिका में फेडरल रिजर्व की नीतियों ने अंततः बहुत ऊंची दरें ला दीं, और 1980-81 में महंगाई पर काबू पाने के लिए सख्त कदम उठाए गए।

सरकारों ने तब कैसे बदल किया?

1973 के उत्तर में कई देशों ने ऊर्जा नीतियों में भारी बदलाव किए। अमेरिका ने ऊर्जा स्वावलंबन की योजनाएं शुरू कीं और यूरोप व जापान ने नाभिकीय ऊर्जा और वैकल्पिक स्रोतों में निवेश तेज किया। ईंधन दक्षता मानक सख्त हुए, और नवीकरणीय ऊर्जा पर शोध बढ़ा।

लंबी अवधि में कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने अपनी आयात निर्भरता कम की। आज अमेरिका ऊर्जा में काफी आत्मनिर्भर है और 2019 के बाद कुल ऊर्जा का निर्यातकर्ता बन गया है।

सरकारें अब क्या कर रही हैं?

IEA के 32 सदस्य देशों ने अभूतपूर्व रूप से अपनी रणनीतिक भंडारों से 400 मिलियन बैरल जारी करने का फैसला किया। यह 2022 की रिलीज़ से दोगुनी मात्रा से अधिक है। अमेरिका इस साल अकेले 172 मिलियन बैरल देने वाला है और कुछ तेल कंपनियों को अस्थायी रूप से 45 मिलियन बैरल उधार भी दिए गए।

सदस्य देश सामूहिक तौर पर 1.2 बिलियन से अधिक बैरल अपने रिज़र्व में रखते हैं और इंडस्ट्री के पास सरकारी बाध्यता के तहत अतिरिक्त 600 मिलियन बैरल हैं। फिर भी यह राहत केवल अस्थायी है और अगर हॉरमुज़ लंबी अवधि के लिए बंद रहा तो यह पूरी तरह से कवर नहीं कर पाएगा।

कई देशों ने नागरिकों और व्यवसायों को यात्रा कम करने, घर से काम करने और रसोई के लिए बिजली का प्रयोग बढ़ाने जैसी सिफारिशें दीं, ताकि डीजल, हीटिंग ऑइल और जेट फ्यूल की मांग थोड़ी घटे। विशेषज्ञ कहते हैं कि ये कदम तब तक सीमित असर दिखाएंगे जब तक भौतिक सप्लाई बहाल नहीं होती।

यह संकट 1973 से कैसे अलग है?

  • श्रोत और ढांचा अलग है: 1973 में अनेक अरब राष्ट्रों ने संगठित रूप से पश्चिमी देशों को निशाना बनाया। आज समस्या किसी एक अभिनेता के नियंत्रण में स्थित जलसंधि के ब्लॉकेज से जुड़ी है, न कि एक समन्वित उत्पादन कट से।
  • विकास और विविधीकरण: 1973 के बाद दुनियाभर में कुछ विविधीकरण हुआ है। तेल का वैश्विक प्राथमिक ऊर्जा में हिस्सा 1973 में 46.2 प्रतिशत से घटकर आज 30.2 प्रतिशत रह गया है। पर यह परिवर्तन मुख्यतः OECD देशों तक सीमित रहा; कई विकासशील देश अभी भी अत्यधिक निर्भर हैं।
  • किसकी सबसे अधिक शिकायत है: 1973 में झटका पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं पर ज्यादा था। 2026 में सबसे कमजोर आर्थिक क्षेत्र विकासशील एशियाई बाजार हैं, जिनकी तेज़ विकास दर और आपूर्ति निर्भरता उन्हें अधिक संवेदनशील बनाती है। लगभग 80 प्रतिशत उनके आयात का रास्ता हॉरमुज़ से गुजरता है। उदाहरण के तौर पर वियतनाम के पास तेल भंडार 20 दिनों से भी कम हैं; पाकिस्तान और इंडोनेशिया के पास लगभग 20 दिन के बराबर भंडार हैं।

नतीजा यह है कि जबकि 1973 और आज के संकट में कई समान वित्तीय और सामाजिक जोखिम हैं, आज का संकट सप्लाई चैन और भौगोलिक संवेदनशीलता के अलग सेट के कारण अधिक जटिल और व्यापक असर पैदा कर सकता है।

नोट: यह लेख उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों और विशेषज्ञ अनुमानों पर आधारित है। सरकारों और अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा समय-समय पर घोषित नई जानकारी स्थिति को बदल सकती है।