ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियन ने युद्ध खत्म करने के लिए साफ शर्त रख दी हैं और इससे कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि तेहरान अब गरमाबी कम कर सकता है। यह मामला तब आया जब यूएस-इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष अपने तेरहवें दिन में था।
पेज़ेश्कियन ने क्या माँगा?
राष्ट्रपति ने सार्वजनिक बयान में कहा कि युद्ध का अंत तभी होगा जब तीन चीजें पूरी हों: ईरान के वैध अधिकारों को स्वीकार किया जाए, ईरान को मुआवज़ा दिया जाए, और भविष्य में फिर से हमले न हों, ऐसी मजबूत अंतरराष्ट्रीय गारंटी दी जाएं। उन्होंने बताया कि उन्होंने रूस और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों से भी बात की और ईरान की शान्ति की प्रतिबद्धता की पुष्टि की।
क्या यह शान्ति की ओर पहला कदम है?
यह एक असामान्य मोड़ है क्योंकि युद्ध के शुरू होते ही तेहरान ने ठोस बातचीत या युद्धविराम पर तुरंत हामी नहीं भरी थी। पर अब राजनीतिक नेतृत्व कुछ कुटनीतिक झुकाव दिखा रहा है, जबकि देश के सशस्त्र संगठन अभी भी कड़े तेवर बरकरार रखे हुए हैं।
युद्ध का आर्थिक हिसाब क्या हुआ?
- ऊर्जा को हथियार बनाकर दोनों पक्ष एक-दूसरे को आर्थिक दर्द पहुंचा रहे हैं।
- हर्मुज की संकरी जल-मार्ग पर अड़चनें आईं, जिससे वैश्विक तेल और गैस की आपूर्ति बंद-सी हुई है।
- तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ीं; युद्ध से पहले करीब 65 डॉलर प्रति बैरल था और अब 100 डॉलर पार चला गया। ईरान ने चेताया कि कीमत 200 डॉलर तक पहुंच सकती है अगर मार्ग पर रोक बनी रही।
- कुछ अंतरराष्ट्रीय आपात भंडारों से बड़ी मात्रा में तेल छोड़ने का फैसला लिया गया है ताकि आपूर्ति में गिरावट को कम किया जा सके, लेकिन असर कैसा और कब तक होगा यह साफ़ नहीं है।
- नज़दीकी समुद्री हमलों और बमभरी नौकाओं की घटनाओं के कारण इराक ने अपने तेल बंदरगाह बंद कर दिए। ओमान के एक बंदरगाह पर ड्रोन हमले की तस्वीरें भी आईं; ईरान ने इन हमलों में सीधे तौर पर शामिल होने से इनकार किया।
ईरान के अंदर क्या हो रहा है?
देश के अंदर दो धड़कनें साफ़ दिख रही हैं: राजनीतिक नेतृत्व कुछ समाधान की तरफ बात करता है जबकि आर्म्ड विंग, यानी इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स, मजबूत रुख पर कायम है।
राष्ट्रपति ने पड़ोसी देशों से हुई क्षति के लिए माफ़ी भी मांगी और कहा कि तब तक हमला बंद रहेगा जब तक वे अपने क्षेत्र से किसी के विरुद्ध हमले की सुविधा नहीं देते। पर सवाल यह है कि राजनीतिक नेतृत्व का IRGC पर कितना नियंत्रण है।
IRGC सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा काउंसिल को रिपोर्ट करता है, और परिषद के शीर्ष नेताओं में कुछ ऐसे लोगों को देखा जाता है जो सख्त नीति के साथ जुड़े हैं। युद्ध के दौरान सत्ता-संरचना में आई ये विषमताएँ अब और ज़्यादा दिखने लगी हैं।
अमेरिका और इजरायल क्या कह रहे हैं?
दोनों पक्षों की भी बातों में तालमेल कम दिखा। अमेरिकी नेतृत्व ने कहा कि लक्ष्य जल्द पूरे हो जाएंगे और युद्ध समाप्त होगा, जबकि इजरायल के रक्षा मंत्री ने कहा कि अभियान तब तक चलेगा जब तक लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो जाती।
दूसरी तरफ युद्ध की लागत भी बहुत बड़ी निकली है: शुरुआती दिनों में अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं, महँगे हथियारों और लॉजिस्टिक्स की वजह से रोज़ाना करोडो डॉलर का बिल बन रहा है। इस वजह से भी राजनीतिक दवाब बढ़ रहा है कि किसी तरह जल्दी रास्ता निकाला जाए।
कौन तय करेगा युद्ध का अंत?
विश्लेषकों का मानना है कि इस बार युद्ध का अंतिम फैसला ईरान पर ही निर्भर कर सकता है। उसकी क्षमता कि वह समुद्री मार्ग बंद कर दे, बैंकों या ऊर्जा आपूर्ति को निशाना बना सके, उसे बड़ा आर्थिक рыवर देता है। सरल शब्दों में, ईरान के पास दूसरे तरीके हैं जिससे वह पूरी दुनिया को दर्द पहुंचा सकता है और इसलिए शर्तें रखने की उसकी ताकत अधिक है।
निष्कर्ष यह है कि राष्ट्रपति की शर्तें एक राजनयिक दरवाज़ा दिखाती हैं पर जमीन पर निर्णायक शक्ति और भी कई हाथों में है। युद्धविराम या समझौता तभी साकार होगा जब सैन्य दबाव, आर्थिक लागत और राजनीतिक इच्छाशक्ति किसी तरह संतुलित हो जाएं।
संक्षेप में: राष्ट्रपति ने शान्ति की शर्तें रखीं, पर इलाके में हथियार कड़े हैं और आर्थिक विराम ने खेल में नई रणनीतियाँ ला दी हैं। जो भी अगला कदम होगा, वह सिर्फ़ सैन्य जीत या हार से नहीं, बल्कि तेल, पैसा और कूटनीति के जुगाड़ से तय होगा।